Jungle Diary
जंगल की मिट्टी, पत्थर, कंकड बोलने लगते हैं, अनजान दिशाएँ आवाज़ देने लगती हैं, वृक्षों के पत्ते अपनी बोली का संगीत सुनाने लगते हैं, घास अपनी स्वर्णिम या हरी आभा लेकर डोलने लगती है। कभी शेर की दहाड़, कभी मोर का केकारव, कभी भैंसे की आवाज़ तो कभी हिरण की मिमियाती आवाज़। हर सुर, हर आवाज़ आपसे बातें करने लगता है। और आप सिर्फ़ सुकून से बैठ जाओ, शान्ति से सुनते जाओ, जंगल आपसे अपने दिल की बात कहने लगता है। धीरे-धीरे ही सही, अपने राज़ आपके कानों में कहने लगता है।
जंगल ने मुझे बहुत कुछ दिया, जिसे मैं पूरी तरह से शब्दों में बयाँ नहीं कर पा रही हूँ। जंगल का साथ मुझे हरदम भाता रहा, अपना-सा लगता रहा। मुझे याद है गाँव का बचपन। मिट्टी में खेलना, घर के पीछे जो छोटा-सा जंगल था, वहाँ जाकर नये-नये पौधों को ढूँढ़ना मेरा शगल था। जंगल ने मुझे शान्ति-सुकून दिया, जंगल ने मुझे जीवन की ओर देखने का अलग नज़रिया दिया। साथ-साथ जीने का, सबको साथ लेकर चलने का उदार दृष्टिकोण दिया। जंगल ने अपने क़ानून से मुझे अवगत कराया, उसके रहस्य को अलग नज़र से देखने का आत्मज्ञान दिया और क्या- क्या बयाँ करूँ?
सामने झाड़ियों में बाघिन के दो बच्चे अपनी ही दुनिया में मगन होकर खेल रहे थे। झाड़ियों की एक ओर, और एक बच्चा बिल्कुल आराम से बांबू की जड़ों से सट कर लेटा हुआ था और वे दोनों उसकी दूसरी ओर, दूसरे बांबू के पास खेल रहे थे। एक अपनी पीठ के बल पर चारों टाँगों को ऊपर उठाकर दायें-बायें करवट लेकर मस्ती में डोल रहा था। उसके एक हाथ में एक लम्बी-सी हड्डी थी। शायद उसकी माँ ने जो शिकार लाकर वहाँ रखा था, उसके खाने के पश्चात् यह हड्डी वहाँ शेष रही होगी। वह उस हड्डी के साथ बिल्कुल मज़े से खेल रहा था और उसकी बहन उसका साथ दे रही थी। दोनों किन्हीं शरारती बच्चों की तरह एक-दूसरे के साथ खेल रहे थे। दूसरा उसकी पूँछ पकड़ कर खींच रहा था, जबकि पहला उसके कान काट रहा था। फिर दोनों उस हड्डी को ऊपर उठाकर दाँतों से चबा रहे थे और यह इन तीन बच्चों का, नहीं-नहीं, दो बच्चों का जो शरारतनामा चल रहा था, वह हम लोग बड़ी दिलचस्पी से, चाहत से देख रहे थे। हमें पता था कि उनकी माँ कभी भी वहाँ आ सकती है...
इसी किताब से...
| SKU | 9789373481166-PB |
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| Publication | Bharatiya Jnanpith |
