Raja Jo Bana Rani

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हर शनिवार को पिता मुझे लंच के लिए ले जाते : फ्रूट सलाद, और आइसक्रीम। एक लड़की भी हमसे आ मिलती। मैं उसे पसन्द करता था क्योंकि मैं हमेशा अकेले ही रहा करता था। मैं किसी आंटी, अंकल, कज़िन, दादा-दादी को नहीं जानता था, न ही मेरा कोई साथी हुआ करता था। माँ ने उस लड़की को लेकर मुझसे सवाल किया। क्या वह जवान थी? क्या वह गोरी थी? मैंने क़िस्से गढ़कर सुनाये, मैं लड़की के बारे में माँ की सबसे बुरी आशंकाओं के साथ खेलने लगा। यह अफ़सोस और नाराज़गी की बात थी कि माँ की शायद कोई प्रतिद्वन्द्वी भी थी। वह लड़की हमें फिर कभी नहीं दिखी।
स्कूल में मैं शर्मीला था। गणित से मुझे नफ़रत थी। मुझे मेमरीड्रॉइंग पसन्द थी। कला सिखाने वाले मास्टर ने एक बार मुझे छुआ लेकिन मैं परे हट गया। मैंने नाटक विषय लिया। औरतों के सारे किरदार मुझे मिलते : क्रिसमस पेजेंट में मार्था, अमाल एंड नाइट विजिटर्स में माँ, दीज़ कॉर्नफील्ड्स में बीवी, जिसका किरदार मैंने ऐसे अदा किया मानो वह बुर्के वाली लेडी मैकबेथ हो, क्योंकि विग और नक़ली मेकअप लगाना बुरा माना जाता था। एक जोरू के ग़ुलाम पति के किरदार के लिए मुझे एक पुरस्कार मिला था। तब मेरी दाढ़ी निकल रही थी।
माँ को गठिया था। अब वो लाचार थीं और बैसाखी के सहारे चलती थीं। नर्सिंग होम में एक चूहे ने सोते हुए उनको कुतर लिया था। वे किसी और जगह रहने का ख़र्च नहीं उठा सकती थीं। पिता ने फिर से उन्हें छोड़ दिया था। केस नम्बर 36 ऑफ़ 1963। चीज़ें मेरी समझ से बाहर थीं।
माँ को घर से बाहर करके पिता ने ताला लगा दिया था। उन्होंने शीशे का दरवाज़ा खोलने में अपनी बाँह को ज़ख़्मी कर लिया। उन्होंने अपना बचाव करते हुए पिता के माथे पर एक पत्थर दे मारा। पहली बार मैंने पिता को रोते हुए देखा। एक नौकर ने उनकी ख़ातिरदारी की। नौकर ने ही माँ को समन्दर में जाकर डूब जाने से रोका। मेरी माँ को शाप था कि हर मुबारक मौक़े पर उन्हें गमज़दा होना ही था। खाने को फ़र्श पर फेंक दिया गया था। हम हैरान-परेशान बिस्तर में से निकले, बत्तियाँ फिर से जलीं, माँ पड़ोसियों से मदद के लिए रात भर चीख़ती रहीं। सोने के कपड़ों में ही मैं अपनी माँ के साथ पुलिस के पास गया। मुझे नहीं पता था कि मेरे माँ-बाप ने क्यों शादी की थी, न ही स्कूल के साइकियेट्रिस्ट को पता था जिसने मुझे क्यूरेटर बनने के लिए कहा था।
— इसी पुस्तक से

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9789373486253-HB
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Publication Vani Prakashan
होशांग मर्चेंट (Hoshang Marchent)

होशांग मर्चेंट ने नैतिकता की सीख अपने ज़रथुष्ट्री पुरखों से पायी, अपना सौन्दर्यबोध अपनी बेचैन रहने वाली माँ से, और भोग की कला अपने पिता से, जो एक युवा विधवा के वारिस थे। पश्चिम में शिक्षा पाकर भी, मर्चेंट ने अपनी यात्राओं के दौरान पूरबी धर्मों का अध्ययन करना चुना। शिक्षा से लोकतान्त्रिक, स्वभाव से आभिजात्य हैं; सहज कवि होते हुए भी, वे पेशे से प्राध्यापक हैं। उनके कई कविता-संग्रह प्रकाशित हुए हैं और वे 'याराना : गे राइटिंग फ्रॉम साउथ एशिया' के सम्पादक हैं। वे हैदराबाद में उस घर में अकेले रहते हैं, जिसे उन्होंने ख़ुद बनाया है। यहाँ वे अपनी किताबों, अपने विद्यार्थियों और एक युवा मित्र के संरक्षक हैं।
होशांग मर्चेंट 30 पुस्तकों के लेखक हैं। उन्होंने हैदराबाद विश्वविद्यालय में 26 वर्षों तक पढ़ाया। उनके शोध-पत्र कॉर्नेल विश्वविद्यालय में संग्रहित हैं। उन्हें 2019 में 'रेनबो वॉरियर्स लाइफ़टाइम अचीवमेंट अवार्ड' से सम्मानित किया गया।

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